Tarap rahe hai zameen par akbar padar gale se laga raha h

 तड़प रहे हैं जमी पर अकबर पदर गले से लगा रहा है

 जो बार उठे ना अंबिया से हुसैन तन्हा उठा रहा है 


*गुनाह बख्शे खताएँ बक्शी बदल दी दोजक से राहें जन्नत

 बनाया काबे को जिसने  काबा वह हुर की किस्मत बना रहा है 


*नवासा अहमद का मुस्तरीब है कहां वह मकतल कहां वह खेमा 

कदम कदम पर संभल संभल कर जवां का लाशा उठा रहा है


*लगी है नूरे नजर के बरछी शहीद अब्बास हो चुके हैं

 हर एक मंजिल पर शाहे दी के लबों पे शुक्रे खुदा रहा है 


*अभी उठाई हैं लाशे अकबर अभी बनाना है नन्ही  तुरबत 

हुसैन पर जो गुजर रही है वह उनका चेहरा बता रहा है 


*कहां है नासिर कहां है यावर कि रन में सिब्ते नबी है तन्हा 

सदाए हलमिन से है कयामत अंधेरा आंखों में छा रहा है

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