हदीस किसा
जाते खुदा से अफजलों बेहतर कोई नही बादब रसूले पाक से बढ़कर कोई नहीं मुख्तारे कायनात के दामाद है अली जाने बहारे गुलशने एजाज है अली जाने अली ओ फातिमा जहैरा हसन हुसैन शहजादे गाने कोनो मका नूरे मशरैकैन इनको सलाम क्यों न जबाने बशर हो लाल खुद जिसका मदहां खा हो खुदा वनदे जुल जलाल *दौलत सराए फातिमा जहरा में एक दिन दाखिल हुये रसूले खुदा शाहे इनसो जिन कहने लगें कि ए मेरी शह पारए जिगर पाता हूं अपनी जिस्म में कुछ ज़ोफ़ का असर बोली बतूल आपको खालिक जहान में रखें हर एक ज़ोफ़ से हिफ़्ज़ो अमांन में फिर योंवरे फिशॉ हुए महबूबे किबरिया वह चादरें यामानी मुझे लाके दो उड़ा जब दुख्तरे अजीम खुदा बंदे जुल मनन चादर उड़ा चुकी तो वहां आ गए हसन *मां को सलाम करके हुए योवरे फ़िशा खुशबू मैं अपने नाना की हूं सूंघता यहां फरमाया फतिमा ने के हां ए मेरे कमर लेटे हुए हैं ज़ेरे किसा सैयदुल बशर यह सुनते ही वह सरवरे आले रसूल रब बादत सलाम नाना से बोला बसद अदब क्या मैं भी आऊं आपकी कमली मे नाना जान बोले ...